फोन हाथ में लो, दस मिनट बाद देखो तो एक घंटा निकल चुका होता है। यह सिर्फ आपके साथ नहीं होता। पूरी एक जनरेशन के साथ हो रहा है। Gen Z यानी वो लोग जो स्मार्टफोन और इंटरनेट के साथ बड़े हुए, आज मानसिक तौर पर पहले से कहीं ज्यादा थके हुए, चिड़चिड़े और परेशान दिख रहे हैं। और इसकी वजह सिर्फ “ज्यादा फोन चलाना” नहीं है। वजह यह है कि उनका दिमाग हर दिन किस तरह के इनपुट से गुजर रहा है।
भारत में यह मुद्दा और भी बड़ा है। डाटा रिपोर्टल के 2025 के आंकड़ों की मानें तो देश में 82 करोड़ से ज्यादा लोग इंटरनेट इस्तेमाल करते हैं, और इनमें से करीब 47 करोड़ लोग सोशल मीडिया पर सक्रिय हैं। एक आम भारतीय यूजर रोजाना करीब 2.7 घंटे सोशल मीडिया पर बिताता है। और सबसे ज्यादा समय बिताने वाला ग्रुप 18 से 24 साल की उम्र का है, यानी सीधे Gen Z। IIT बॉम्बे और NIMHANS की एक संयुक्त रिपोर्ट यह भी बताती है कि करीब 36% भारतीय किशोर रोज सोशल मीडिया कंटेंट से तनाव और चिंता महसूस करते हैं।
इस लेख में हम समझेंगे कि सोशल मीडिया, वीडियो गेम्स, डेटिंग ऐप्स और डिजिटल दुनिया की बाकी चीजें Gen Z की मानसिक सेहत को कैसे और क्यों प्रभावित कर रही हैं, और इस बारे में क्या किया जा सकता है।
Gen Z में मानसिक स्वास्थ्य की समस्या इतनी बड़ी क्यों दिख रही है
Gen Z का पूरा सामाजिक जीवन, पढ़ाई, करियर और यहां तक कि रिश्ते भी डिजिटल स्क्रीन से जुड़े हुए हैं। पुरानी पीढ़ियों के लिए फोन एक टूल था। इस पीढ़ी के लिए यह लगभग एक अतिरिक्त इंद्रिय जैसा बन गया है, जिसके बिना दिन गुजरना मुश्किल लगता है।
दिलचस्प बात यह है कि सिर्फ स्क्रीन पर बिताया गया समय समस्या नहीं है। असली समस्या यह है कि उस समय में दिमाग को किस तरह की उत्तेजना मिल रही है। हर नोटिफिकेशन, हर लाइक, हर नया वीडियो दिमाग में डोपामिन नाम के केमिकल का एक छोटा सा रिलीज कराता है। यही केमिकल हमें बार-बार फोन उठाने पर मजबूर करता है, ठीक वैसे ही जैसे कोई आदत लत में बदल जाती है। जितनी बार यह चक्र दोहराया जाता है, दिमाग उतना ही तेज इनाम मांगने लगता है, और असल जिंदगी की धीमी, शांत चीजें, जैसे पढ़ाई या बातचीत, उतनी ही बोरिंग लगने लगती हैं।
सोशल मीडिया और मानसिक स्वास्थ्य का कनेक्शन
सोशल मीडिया पर हर कोई अपनी जिंदगी का सबसे अच्छा हिस्सा दिखाता है। छुट्टियां, नई नौकरी, परफेक्ट फिगर, खुशहाल रिश्ते। यह पूरी तस्वीर सच नहीं होती, लेकिन दिमाग इसे बार-बार देखकर उसे सामान्य मान लेता है।
जब कोई लगातार अपनी असली, अधूरी जिंदगी की तुलना दूसरों की चुनी हुई, सजी हुई जिंदगी से करता है, तो उसका आत्ममूल्य यानी सेल्फ एस्टीम धीरे-धीरे कमजोर पड़ने लगता है। एक हाल की स्टडी में सामने आया कि करीब 61% छात्राओं ने कहा कि ट्रोलिंग या नेगेटिव कमेंट्स से उन्हें दुख या तनाव महसूस होता है, जबकि लगभग आधी छात्राएं नोटिफिकेशन आते ही तुरंत फोन चेक करने की आदत में फंस चुकी हैं।
मेंटल हेल्थ एक्सपर्ट्स का कहना है कि सोशल मीडिया पर सेल्फ वर्थ को लेकर बातचीत बहुत आम हो गई है। युवा जानते हैं कि ऑनलाइन दिखाई गई जिंदगी बनावटी है, फिर भी दूसरों से तुलना करने पर उन्हें भावनात्मक रूप से चोट पहुंचती है। पीछे रह जाने का डर, यानी FOMO, और शरीर को लेकर असुरक्षा, इन दोनों का सीधा संबंध सोशल मीडिया पोस्ट्स से देखा गया है।
Cyberbullying का असर सिर्फ ऑनलाइन तक सीमित नहीं रहता
ऑनलाइन उत्पीड़न सिर्फ बुरे कमेंट्स तक सीमित नहीं है। इसमें फर्जी प्रोफाइल, धमकियां, बार-बार अनचाहे मैसेज और निजी जानकारी का गलत इस्तेमाल भी शामिल है। जो युवा इसका सामना करते हैं, उनमें डर, अकेलापन और सामाजिक दूरी बढ़ने की संभावना ज्यादा होती है। कई बार इसका असर आत्मविश्वास पर इतनी गहराई से पड़ता है कि व्यक्ति असल जिंदगी में भी लोगों से जुड़ने से बचने लगता है।
Doomscrolling क्या है और दिमाग पर इसका असली असर कैसे पड़ता है
Doomscrolling यानी लगातार नकारात्मक, डरावनी या परेशान करने वाली खबरें और पोस्ट्स देखते रहना, भले ही इससे मन अच्छा महसूस न हो। यह आदत सिर्फ समय बर्बाद नहीं करती, यह दिमाग की बनावट को धीरे-धीरे बदल भी सकती है।
जब हम बार-बार डर, गुस्सा या दुख से जुड़ी खबरें देखते हैं, तो दिमाग का एक हिस्सा जिसे एमिगडाला कहा जाता है, ज्यादा सक्रिय हो जाता है। यही हिस्सा हमारे डर और खतरे को पहचानने का काम करता है। नतीजा यह होता है कि दिमाग लगातार हाई अलर्ट मोड में रहने लगता है, जैसे हर वक्त कोई खतरा सामने हो, भले ही असल में कुछ न हो रहा हो। समय के साथ यह पैटर्न दिमाग की न्यूरल सर्किट को इस तरह ढाल देता है कि वह नेगेटिव जानकारी को तुरंत पकड़ लेता है, जबकि अच्छी और सकारात्मक चीजों पर ध्यान देने की क्षमता कमजोर पड़ने लगती है।
Doomscrolling की आदत पहचानना मुश्किल नहीं है। बिना किसी वजह के बार-बार न्यूज फीड खोलना, बुरी खबर देखने के बाद भी स्क्रॉल करते रहना, सोने से पहले नेगेटिव कंटेंट में उलझे रहना, और स्क्रीन टाइम घटाने की कोशिश के बावजूद उसी आदत में लौट आना, यह सब इसके संकेत हैं। अगर इससे नींद, मूड या पढ़ाई पर असर पड़ने लगे, तो इसे सिर्फ आदत समझकर नजरअंदाज करना ठीक नहीं है।
वीडियो गेम्स की लत और आक्रामक व्यवहार का सच
Gen Z का एक बड़ा हिस्सा रोज कई घंटे वीडियो गेम्स में बिताता है। गेमिंग खुद में गलत नहीं है, यह मनोरंजन और सामाजिक जुड़ाव का भी जरिया हो सकता है। समस्या तब शुरू होती है जब दिमाग गेम के अंदर मिलने वाले तुरंत इनाम का आदी हो जाता है।
गेम के हर लेवल, हर जीत पर दिमाग को तुरंत संतुष्टि मिलती है। इसकी वजह से पढ़ाई, बातचीत या कोई भी धीमी, real-life activity फीकी लगने लगती है, क्योंकि उनमें उतनी तेज उत्तेजना नहीं मिलती। लंबे समय तक बिना रुके गेमिंग करने वाले बच्चों में गेम रोकने पर चिड़चिड़ापन, बेचैनी और गुस्से जैसी भावनात्मक प्रतिक्रियाएं देखी गई हैं। विशेषज्ञ इसे डिस्रेगुलेशन कहते हैं, यानी भावनाओं पर नियंत्रण कमजोर पड़ना।
हिंसक वीडियो गेम्स को लेकर लंबे समय से बहस रही है कि क्या इनसे आक्रामक व्यवहार बढ़ता है। सच यह है कि सिर्फ गेम को इसका इकलौता कारण मानना सही नहीं होगा। परिवार का माहौल, व्यक्तित्व और सामाजिक परिस्थितियां भी उतनी ही अहम भूमिका निभाती हैं। लेकिन जब गेमिंग पर कंट्रोल कमजोर पड़ने लगे और इसकी वजह से नींद, पढ़ाई या रिश्ते प्रभावित होने लगें, तो यह ध्यान देने लायक बात बन जाती है।
डेटिंग ऐप्स, तुरंत संतुष्टि और भावनात्मक थकान
Tinder और Bumble जैसे ऐप्स ने लोगों से जुड़ने का तरीका बदल दिया है। लेकिन स्वाइप कल्चर ने एक नई आदत भी डाल दी है, तुरंत संतुष्टि की चाहत। जब किसी को हर चीज तुरंत चाहिए, चाहे वह पसंद हो या रिश्ता, तो वह असली भावनात्मक जुड़ाव बनाने की धीमी प्रक्रिया से बचने लगता है।
बार-बार रिजेक्शन मिलना, या दूसरों की प्रोफाइल फोटो से खुद की तुलना करना, आत्मविश्वास को कमजोर कर सकता है। जब सेल्फ वर्थ सिर्फ ऑनलाइन मिलने वाले रिएक्शन पर टिका होने लगे, तो अकेलापन और आत्म-संदेह गहराने लगता है। डेटिंग ऐप्स का इस्तेमाल खुद में मानसिक समस्या नहीं है, लेकिन जब इससे नींद, मूड या रोजमर्रा की जिंदगी प्रभावित होने लगे, तो यह जरूर सोचने की बात है।
करियर का दबाव और अनिश्चित भविष्य की चिंता
Gen Z की मानसिक सेहत को सिर्फ स्क्रीन ही नहीं, बल्कि करियर को लेकर बढ़ता दबाव भी प्रभावित करता है। मेंटल हेल्थ एक्सपर्ट्स बताते हैं कि आजकल कई युवा बहुत कम उम्र में सफलता का दबाव महसूस करने लगते हैं, यहां तक कि उन्हें डर रहता है कि एक गलत करियर फैसला उनकी पूरी जिंदगी बिगाड़ सकता है। पढ़ाई और करियर से जुड़ा बर्नआउट अब सिर्फ बड़ी उम्र के प्रोफेशनल्स तक सीमित नहीं रहा, यह पहले से कहीं जल्दी दिखने लगा है।
सोशल मीडिया पर दूसरों की उपलब्धियां देखकर यह दबाव और बढ़ जाता है। जब कोई लगातार खुद की तुलना दूसरों की सफलता से करता है, तो उसे लगने लगता है कि वह पीछे छूट रहा है, भले ही उसकी अपनी करियर यात्रा किसी और जैसी होने की जरूरत ही न हो।
हर वक्त ऑनलाइन, फिर भी अकेला क्यों महसूस होता है
यह सबसे उलझाने वाली बात है। Gen Z के पास पहले से कहीं ज्यादा डिजिटल कनेक्शन हैं, फिर भी यही पीढ़ी बाकी सभी उम्र के ग्रुप्स से ज्यादा अकेलापन महसूस करने की बात कह रही है। इसकी वजह यह है कि ऑनलाइन बातचीत असली भावनात्मक जुड़ाव की जगह नहीं ले पाती। कई बार डिजिटल जुड़ाव इतना उपलब्ध होता है कि वह असल, आमने-सामने की बातचीत की जगह ले लेता है, बजाय उसे बढ़ाने के।
कई युवा मदद मांगने से भी झिझकते हैं क्योंकि उन्हें डर रहता है कि वे किसी पर बोझ बन जाएंगे। जबकि असल जरूरत यह है कि भावनात्मक निकटता ऑनलाइन उपलब्धता से नहीं, बल्कि किसी के साथ सच में मौजूद रहने से आती है।
नींद पर पड़ने वाला असर
सोने से ठीक पहले स्क्रॉलिंग, गेमिंग या मैसेजिंग की आदत सोने का समय पीछे धकेल देती है। इसका एक शारीरिक कारण भी है, फोन से निकलने वाली ब्लू लाइट शरीर की नींद लाने वाली प्रक्रिया को धीमा कर देती है। जब नींद अधूरी रहती है, तो अगले दिन थकान, चिड़चिड़ापन और ध्यान लगाने में दिक्कत होना आम बात हो जाती है। यह पैटर्न लंबे समय तक चले तो पूरी मानसिक सेहत पर असर डाल सकता है।
चेतावनी के वो संकेत जिन्हें नजरअंदाज नहीं करना चाहिए
हर तनाव या हल्की उदासी मानसिक बीमारी नहीं होती। लेकिन कुछ संकेत हैं जिन्हें गंभीरता से लेना चाहिए:
- लगातार बनी रहने वाली चिंता या बेचैनी
- छोटी-छोटी बातों पर तेज चिड़चिड़ापन
- लगातार उदासी, खालीपन या निराशा का एहसास
- सोशल मीडिया या गेमिंग पर कंट्रोल न रख पाना
- नींद का पैटर्न लगातार बिगड़ना
- पढ़ाई या काम में ध्यान लगाने में दिक्कत
- परिवार और दोस्तों से दूरी बढ़ना
- खुद को लेकर लगातार नकारात्मक सोच
अगर किसी को खुद को नुकसान पहुंचाने या आत्महत्या से जुड़े विचार आ रहे हों, तो इसे तुरंत इमरजेंसी की तरह लेना चाहिए और तुरंत किसी योग्य मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ या नजदीकी इमरजेंसी सेवा से संपर्क करना चाहिए।
डिजिटल दुनिया में मानसिक सेहत संभालने के व्यावहारिक तरीके
फोन को पूरी तरह छोड़ना न तो जरूरी है, न ही मुमकिन। असली जरूरत है, इस्तेमाल को संतुलित बनाना।
रोजाना एक तय समय पर फोन से पूरी तरह दूरी बनाना मददगार होता है। इसे स्क्रीन टाइम ऐप की मदद से ट्रैक भी किया जा सकता है, ताकि यह साफ पता चले कि दिन का कितना हिस्सा फोन पर जा रहा है। सोने से करीब एक घंटा पहले सोशल मीडिया और नेगेटिव न्यूज से दूरी बना लेना, नींद की क्वालिटी को काफी हद तक सुधार सकता है। रात में फोन को बिस्तर से थोड़ी दूरी पर रखना भी एक छोटी लेकिन असरदार आदत है।
अनावश्यक नोटिफिकेशन बंद करना बार-बार फोन चेक करने की आदत को कम कर सकता है। इसके साथ ही पढ़ना, टहलना, योगा या कोई भी ऐसी एक्टिविटी जिसमें असल दुनिया से जुड़ाव हो, दिमाग को उस लगातार उत्तेजना से आराम देती है जो डिजिटल दुनिया देती रहती है। परिवार के साथ ‘नो फोन डिनर’ जैसे छोटे नियम बनाना भी असल रिश्तों को मजबूत करने में मदद करता है।
यह सारे बदलाव सहायक जरूर हैं, लेकिन अगर मानसिक तनाव पहले से गहरा हो चुका है, तो इन्हें इलाज का विकल्प नहीं बल्कि सहारा समझना चाहिए। असली राहत के लिए किसी योग्य विशेषज्ञ की मदद जरूरी हो सकती है।
डॉक्टर या Mental Health Professional से कब संपर्क करें?
अगर सोशल मीडिया, गेमिंग, साइबरबुलिंग, डेटिंग ऐप्स या लगातार डिजिटल इस्तेमाल की वजह से आपकी नींद, पढ़ाई, काम, रिश्ते या रोजमर्रा की जिंदगी लगातार प्रभावित हो रही है, तो इसे सिर्फ एक फेज़ या आदत समझकर नजरअंदाज न करें।
इनमें से कोई भी संकेत लगातार बना रहे, तो किसी योग्य mental health professional से बात करना सही कदम हो सकता है:
- लगातार चिंता, बेचैनी या तनाव
- लंबे समय तक उदासी, खालीपन या निराशा
- सोशल मीडिया या गेमिंग पर कंट्रोल न रहना
- नींद का लगातार बिगड़ना
- पढ़ाई या काम में ध्यान लगाने में परेशानी
- परिवार और दोस्तों से दूरी बढ़ना
- खुद को लेकर लगातार नकारात्मक विचार
- डिजिटल आदतों का रोजमर्रा की जिंदगी पर असर
अगर खुद को नुकसान पहुंचाने या आत्महत्या से जुड़े विचार आ रहे हों, तो इसे तुरंत गंभीर स्थिति मानें और qualified mental health professional या नजदीकी emergency service से मदद लें।
अगर neurological symptoms, जैसे अचानक कमजोरी, सुन्नपन, बोलने में परेशानी, seizures या लगातार गंभीर headache, भी मौजूद हों, तो neurologist से evaluation जरूरी हो सकता है। HealthPil पर Dr. Rahul Chawla की Neurology Profile देख सकते हैं। उनकी profile के अनुसार वे DM Neurology (AIIMS New Delhi) qualified neurologist हैं और stroke, headache, epilepsy, migraine तथा अन्य neurological conditions देखते हैं।
Neurological health और related medical guidance के बारे में अधिक जानकारी के लिए Dr. Rahul Chawla की official website भी देख सकते हैं।
HealthPil आपकी कैसे मदद कर सकता है
HealthPil पर आप अनुभवी मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों से online consultation बुक कर सकते हैं। अगर आप या आपका कोई अपना सोशल मीडिया स्ट्रेस, गेमिंग की लत, साइबरबुलिंग, नींद की समस्या या एंग्जायटी से जूझ रहा है, तो हमारी टीम आपकी मदद के लिए मौजूद है। हमारे प्लेटफॉर्म पर appointment बुक करें और video consultation के जरिए घर बैठे विशेषज्ञ सलाह पाएं।
निष्कर्ष
Gen Z की मानसिक सेहत पर असर डालने वाला कोई एक कारण नहीं है। सोशल मीडिया, doomscrolling, गेमिंग, डेटिंग ऐप्स, साइबरबुलिंग, करियर का दबाव, नींद की कमी और डिजिटल दुनिया में होते हुए भी असल जुड़ाव की कमी, यह सब मिलकर मानसिक सेहत को धीरे-धीरे प्रभावित करते हैं। फोन का इस्तेमाल खुद में बीमारी नहीं है। असली चिंता तब शुरू होती है जब इस पर कंट्रोल कमजोर पड़ने लगे और उसका असर नींद, पढ़ाई, रिश्तों और रोजमर्रा की जिंदगी पर दिखने लगे। समय रहते संतुलन बनाना और जरूरत पड़ने पर सही मदद लेना, इस डिजिटल दौर में मानसिक सेहत बनाए रखने का सबसे भरोसेमंद तरीका है
FAQ (Frequently Asked Questions)
1. क्या सोशल मीडिया Gen Z की मानसिक सेहत को प्रभावित कर सकता है?
हां, सोशल मीडिया का अत्यधिक या अनियंत्रित इस्तेमाल कुछ लोगों में तनाव, एंग्जायटी, low self-esteem, अकेलापन और social comparison जैसी समस्याओं को बढ़ा सकता है। खासकर जब सोशल मीडिया का असर नींद, पढ़ाई, काम या रिश्तों पर पड़ने लगे।
2. Doomscrolling क्या है और यह मानसिक स्वास्थ्य को कैसे प्रभावित करता है?
Doomscrolling का मतलब लगातार नकारात्मक, डरावनी या परेशान करने वाली खबरें और पोस्ट्स देखते रहना है। इसकी आदत से तनाव और बेचैनी बढ़ सकती है और अगर इससे नींद, मूड या पढ़ाई प्रभावित होने लगे, तो इसे नजरअंदाज नहीं करना चाहिए।
3. क्या ज्यादा गेम खेलने से Gen Z की mental health प्रभावित हो सकती है?
सिर्फ वीडियो गेम खेलना मानसिक स्वास्थ्य समस्या नहीं है। लेकिन जब gaming पर कंट्रोल कम हो जाए और इसकी वजह से नींद, पढ़ाई, रिश्ते या रोजमर्रा की जिंदगी प्रभावित होने लगे, तो यह चिंता का विषय हो सकता है।
4. Gen Z में mental health problems के कौन-कौन से warning signs हैं?
लगातार एंग्जायटी या बेचैनी, चिड़चिड़ापन, उदासी या निराशा, सोशल मीडिया या गेमिंग पर कंट्रोल न रख पाना, नींद खराब होना, concentration में कमी और परिवार या दोस्तों से दूरी बढ़ना महत्वपूर्ण warning signs हो सकते हैं।
5. Gen Z को mental health के लिए डॉक्टर या mental health professional से कब मिलना चाहिए?
अगर social media, gaming या दूसरी digital habits की वजह से नींद, पढ़ाई, काम, रिश्ते या रोजमर्रा की जिंदगी लगातार प्रभावित हो रही है, तो qualified mental health professional से सलाह लेना उचित है। अगर खुद को नुकसान पहुंचाने या आत्महत्या से जुड़े विचार आएं, तो तुरंत professional या emergency सहायता लेनी चाहिए।
References
- Fadillah D, Long B. Empowering Gen Z’s Mental Health in a Hyperconnected World. International Journal of Social Psychiatry. 2026;72(4):876-887. Available at:
PubMed - Dwidienawati D, Pradipto Y, Indrawati L, Gandasari D. Internal and external factors influencing Gen Z wellbeing. BMC Public Health. 2025;25:1584. Available at:
PMC
Disclaimer:
यह जानकारी केवल सामान्य मार्गदर्शन के लिए दी गई है। किसी भी मानसिक विकार, विशेष रूप से Gen Z में उत्पन्न हो रहे मानसिक समस्याओं के बारे में, यह जरूरी है कि आप एक योग्य mental health professional से व्यक्तिगत रूप से परामर्श लें। HealthPil पर हम आपको mental health specialists से परामर्श करने का अवसर प्रदान करते हैं, ताकि आप सही इलाज और मार्गदर्शन प्राप्त कर सकें।
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