अगर आपको भी कभी-कभी अचानक पेट में दर्द होने लगता है, कभी दस्त तो कभी कब्ज़ हो जाता है, और समझ नहीं आता कि आखिर वजह क्या है तो अकेले आप नहीं हैं। यह इरिटेबल बाउल सिंड्रोम (IBS), जिसे इरिटेबल बॉवेल सिंड्रोम भी कहा जाता है, हो सकता है। कुछ रिपोर्ट्स के अनुसार दुनिया भर में करीब 10-11% वयस्क किसी न किसी रूप में IBS से जूझते हैं यानी यह कोई अनोखी या दुर्लभ बीमारी नहीं, बल्कि बेहद आम पाचन समस्या है।
IBS एक functional gastrointestinal disorder है, जिसे disorder of gut-brain interaction भी कहा जाता है। इसमें आंत और मस्तिष्क के बीच होने वाले communication और gut की sensitivity में बदलाव के कारण पेट में दर्द, पेट फूलना और bowel habits में बदलाव जैसे लक्षण होते हैं। कुछ लोग इसे चिड़चिड़ा आंत्र सिंड्रोम या चिड़चिड़ा बृहदान्त्र के नाम से भी जानते हैं। मेडिकल भाषा में इसे कभी-कभी स्पैस्टिक कॉलन, स्पास्टिक आंत्र, या नर्वस पेट भी कहा जाता है ये सब नाम एक ही स्थिति के लिए इस्तेमाल होते हैं।
अच्छी खबर यह है कि IBS आमतौर पर जानलेवा बीमारी नहीं होती और यह आंत को स्थायी नुकसान भी नहीं पहुंचाती। लेकिन यह daily life और quality of life को ज़रूर प्रभावित कर सकती है इसलिए इसे समझना और सही तरीके से मैनेज करना ज़रूरी है।
IBS क्या है?
IBS क्या है, यह समझने के लिए पहले यह जानना ज़रूरी है कि यह कोई एक बीमारी नहीं, बल्कि एक साथ होने वाले कई लक्षणों का समूह है। यह हमारी बड़ी आंत (colon) को प्रभावित करती है। इसमें पेट में दर्द, पेट फूलना और बार-बार कब्ज़ या दस्त (या दोनों) की समस्या हो सकती है।
लक्षणों के आधार पर IBS के प्रकार को तीन भागों में बांटा जाता है:
- IBS-D (Diarrhea-predominant) – अगर आपको ज़्यादातर दस्त की समस्या होती है।
- IBS-C (Constipation-predominant) – अगर ज़्यादा कब्ज़ की समस्या होती है।
- IBS-M (Mixed type) – अगर कभी दस्त, कभी कब्ज़ होता है।
IBS के प्रकार को समझना इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि हर व्यक्ति में प्रमुख समस्या अलग हो सकती है, और treatment भी मुख्य लक्षणों के अनुसार ही तय किया जाता है। IBS-C में कब्ज़ प्रमुख होता है, IBS-D में दस्त प्रमुख होते हैं, जबकि IBS-M में दस्त और कब्ज़ दोनों अलग-अलग समय पर हो सकते हैं।
IBS कितना आम है?
आपको जानकर हैरानी होगी, लेकिन इरिटेबल बॉवेल सिंड्रोम दुनिया भर में कम से कम 10-15% वयस्कों को किसी न किसी रूप में प्रभावित करता है। यह पुरुषों की तुलना में महिलाओं में थोड़ा ज़्यादा देखा जाता है। इसका मतलब यह है कि अगर आपको या आपके किसी परिचित को यह समस्या है, तो यह बहुत आम बात है, और सही जानकारी और इलाज से इसे अच्छे से मैनेज किया जा सकता है।
IBS के लक्षण
IBS के लक्षण हर व्यक्ति में अलग-अलग हो सकते हैं और समय के साथ बदल भी सकते हैं। सबसे आम लक्षणों में शामिल हैं:
- पेट में दर्द और ऐंठन (पेट में मरोड़) – ज्यादातर मोशन (stool) के बाद राहत मिलती है।
- पेट फूलना (bloating) और गैस – पेट भारी लगना या गैस बनना।
- बॉवेल मूवमेंट में बदलाव – कभी दस्त, कभी कब्ज़।
- अनियमित मल त्याग – मल त्याग की आवृत्ति (frequency) में बार-बार बदलाव।
- मल में बलगम आना – कई बार मोशन में कुछ सफेद या चिपचिपी सी चीज़ दिख सकती है।
- अधूरा मल त्याग महसूस होना – मल त्याग करने के बाद भी ऐसा लग सकता है कि पेट पूरी तरह साफ नहीं हुआ।
- मल के स्वरूप में बदलाव – मल कभी बहुत कठोर, तो कभी ढीला या पानी जैसा हो सकता है।
- शौच की आदतों में बदलाव – कुछ लोगों को बार-बार शौच की जरूरत महसूस हो सकती है, जबकि कुछ लोगों को मल त्याग करने में कठिनाई हो सकती है।
ज़्यादातर मामलों में गैस और पेट फूलने के लक्षण मल त्याग के बाद कम हो जाते हैं। कुछ लोगों को लगातार लक्षण महसूस होते हैं, जबकि कुछ में ये आते-जाते रहते हैं।
IBS के कारण
IBS के कारण को समझना थोड़ा जटिल है, क्योंकि इसका कोई एक निश्चित कारण नहीं होता। डॉक्टरों को अभी तक इसका सटीक कारण पूरी तरह पता नहीं है, लेकिन कई factors मिलकर इसके development और लक्षणों में भूमिका निभाते हैं:
- Gut sensitivity (आंत की संवेदनशीलता) – आंतों की ज्यादा सेंसिटिविटी बॉवेल मूवमेंट को प्रभावित कर सकती है। सामान्य पाचन क्रिया पर भी आंत ज़्यादा तेज़ी से प्रतिक्रिया करने लगती है।
- अनियमित आंत्र गतिविधि (motility) – आंतों की मांसपेशियां बहुत तेज़ या बहुत धीमी गति से चल सकती हैं। तेज़ गति से दस्त, गैस और ऐंठन हो सकती है, जबकि धीमी गति कब्ज़ का कारण बन सकती है।
- आंत-मस्तिष्क अक्ष (gut-brain axis) में गड़बड़ी – आंत और मस्तिष्क के बीच लगातार संदेशों का आदान-प्रदान होता रहता है। इसे ही IBS और आंत-मस्तिष्क संबंध कहा जाता है। जब यह coordination ठीक से काम नहीं करता, तो शरीर सामान्य पाचन क्रिया पर भी ज़्यादा प्रतिक्रिया देने लगता है।
- आंत के माइक्रोबायोटा में बदलाव – हमारी आंत में मौजूद अच्छे बैक्टीरिया के संतुलन में बदलाव भी पाचन और मल त्याग की आदतों को प्रभावित कर सकता है।
- Diet (खान-पान) – ज्यादा फैटी फूड, डेयरी, कैफीन, शराब, और आर्टिफिशियल स्वीटनर IBS ट्रिगर कर सकते हैं।
- स्ट्रेस (तनाव) और चिंता – IBS और तनाव का गहरा संबंध है। डिप्रेशन और एंग्ज़ाइटी IBS को और बिगाड़ सकते हैं, खासकर बचपन में या शुरुआती जीवन में हुआ तनाव।
- पेट के संक्रमण के बाद IBS – कई बार पेट में हुए गंभीर बैक्टीरियल इंफेक्शन (जैसे गैस्ट्रोएंटेराइटिस) के ठीक होने के बाद भी आंत का सामान्य कामकाज बाधित रह सकता है, जिससे आगे चलकर IBS हो सकता है।
- हार्मोनल बदलाव और IBS – महिलाओं में पीरियड्स के दौरान हार्मोनल बदलाव के कारण IBS के लक्षण बढ़ सकते हैं।
IBS अक्सर किसी एक कारण से नहीं, बल्कि इन कई कारकों के एक साथ मिलने पर विकसित होता है।
IBS के जोखिम कारक
IBS के जोखिम कारक (risk factors) को जानना भी ज़रूरी है, क्योंकि इनसे यह समझने में मदद मिलती है कि किन लोगों में यह समस्या ज़्यादा देखी जाती है। हालांकि, किसी एक risk factor की मौजूदगी का मतलब यह नहीं है कि व्यक्ति को IBS होना निश्चित है। आम जोखिम कारकों में शामिल हैं:
- 50 वर्ष से कम आयु का होना
- महिला होना (महिलाओं में यह अधिक आम है)
- परिवार में IBS का इतिहास (family history)
- चिंता, अवसाद (anxiety, depression) या अत्यधिक तनाव
- किसी खाद्य पदार्थ से संवेदनशीलता (food intolerance)
- पहले पेट या आंतों में हुआ कोई संक्रमण
- हाल ही में एंटीबायोटिक्स का इस्तेमाल
- कोई अन्य दीर्घकालिक दर्द की समस्या, जैसे फाइब्रोमायल्जिया
IBS के ट्रिगर्स क्या हैं?
IBS के ट्रिगर्स हर व्यक्ति में अलग हो सकते हैं। किसी एक food को हर IBS patient के लिए trigger मानना सही नहीं है हर किसी की आंत अलग तरह से प्रतिक्रिया करती है। आम ट्रिगर्स में शामिल हो सकते हैं:
- बहुत ज्यादा फैटी या तला हुआ खाना
- कुछ डेयरी उत्पाद
- कैफीन
- शराब
- कुछ artificial sweeteners (जैसे सोर्बिटोल)
- गैस बढ़ाने वाले खाद्य पदार्थ, जैसे पत्ता गोभी, बीन्स, प्याज
- तनाव और चिंता
- महिलाओं में मासिक धर्म (menstrual cycle) के दौरान होने वाले हार्मोनल बदलाव
अपने व्यक्तिगत ट्रिगर्स पहचानने के लिए एक food and symptom diary रखना बहुत उपयोगी हो सकता है। इससे यह समझने में मदद मिलती है कि कौन-से foods या situations के बाद लक्षण बढ़ते हैं।
क्या IBS कैंसर में बदल सकता है?
यह एक बहुत आम गलतफहमी है। सच यह है कि IBS को आमतौर पर जानलेवा बीमारी नहीं माना जाता, और IBS अपने आप colorectal cancer में नहीं बदलता। IBS और inflammatory bowel disease (IBD) भी बिल्कुल अलग-अलग conditions हैं IBS एक ऑटोइम्यून विकार नहीं है और यह आंत की परत को नुकसान नहीं पहुंचाता।
हालांकि, IBS जैसे कुछ लक्षण दूसरी digestive diseases में भी दिखाई दे सकते हैं। इसलिए अगर लक्षण नए हैं, लगातार बढ़ रहे हैं, या warning signs के साथ हैं, तो सही diagnosis के लिए डॉक्टर से सलाह लेना ज़रूरी है।
IBS का निदान कैसे होता है?
IBS का निदान आमतौर पर आपके symptoms, medical history और physical examination के आधार पर किया जाता है। डॉक्टर यह समझने की कोशिश करते हैं कि पेट दर्द, bowel movement में बदलाव और अन्य लक्षण कितने समय से हैं और उनका pattern क्या है।
IBS की जांच के दौरान डॉक्टर आमतौर पर इन बातों के बारे में पूछ सकते हैं:
- पेट दर्द कितनी बार और कितने समय से हो रहा है?
- दर्द का bowel movement से क्या संबंध है?
- कब्ज़ या दस्त कितनी बार होते हैं?
- मल के स्वरूप या consistency में कोई बदलाव आया है?
- क्या पेट फूलना या गैस की समस्या भी है?
- क्या परिवार में किसी को colorectal cancer या अन्य digestive disease रही है?
- क्या कोई warning symptoms मौजूद हैं?
कुछ patients में डॉक्टर अन्य conditions को rule out करने के लिए IBS के लिए रक्त परीक्षण, IBS के लिए मल परीक्षण या अन्य जांच की सलाह दे सकते हैं। हर IBS patient को एक जैसी जांच की जरूरत नहीं होती। यदि कुछ warning signs मौजूद हों, तो डॉक्टर additional tests की सलाह दे सकते हैं।
IBS का इलाज
IBS का इलाज मुख्य रूप से तीन हिस्सों में बांटा जा सकता है खान-पान और जीवनशैली में बदलाव, दवाइयां, और मनोवैज्ञानिक थेरेपी। सबसे पहली बात समझनी ज़रूरी है: IBS का कोई एकमुश्त, स्थायी इलाज (cure) नहीं है, लेकिन इसके लक्षणों को असरदार तरीके से मैनेज किया जा सकता है।
1. खान-पान और जीवनशैली में बदलाव
IBS में खान-पान और IBS के लिए डाइट का सही चुनाव लक्षणों को काफी हद तक नियंत्रित कर सकता है।
- Low FODMAP Diet – यह एक dietary approach है जिसमें कुछ ऐसे fermentable carbohydrates को सीमित किया जाता है जो कुछ लोगों में गैस, bloating और पेट दर्द जैसे symptoms को trigger कर सकते हैं। यह diet हर व्यक्ति के लिए ज़रूरी नहीं होती और इसे लंबे समय तक बहुत restrictive तरीके से follow करना उचित नहीं है। ज़रूरत पड़ने पर dietitian की guidance में इसे अपनाया जा सकता है।
- IBS में फाइबर – फाइबर का चुनाव और मात्रा व्यक्ति के symptoms के अनुसार होनी चाहिए। कुछ लोगों में soluble fiber, जैसे psyllium/isabgol, symptoms को manage करने में मदद कर सकता है। बहुत अधिक fiber अचानक बढ़ाने से गैस और bloating भी बढ़ सकती है, इसलिए diet में बदलाव डॉक्टर या dietitian की सलाह से करना बेहतर है।
- IBS में प्रोबायोटिक्स – कुछ लोगों को probiotics से digestive symptoms में फायदा महसूस हो सकता है, लेकिन IBS में इनके प्रभाव के evidence हमेशा consistent नहीं होते। इसलिए इन्हें routine treatment के रूप में शुरू करने से पहले डॉक्टर से सलाह लेना बेहतर है।
- IBS में व्यायाम – नियमित एक्सरसाइज़, खासकर एरोबिक्स, से Gut motility (गट मोटिलिटी) बेहतर होती है, जो लक्षणों को कम करने में मदद कर सकती है।
रोज़मर्रा की आदतों में बदलाव
IBS को मैनेज करने के लिए केवल diet ही नहीं, बल्कि daily lifestyle पर भी ध्यान देना ज़रूरी है:
- नियमित physical activity और exercise करें।
- पर्याप्त पानी पिएं और dehydration से बचें।
- पर्याप्त और नियमित नींद लेने की कोशिश करें।
- IBS में तनाव प्रबंधन के लिए deep breathing, meditation, yoga या relaxation techniques का इस्तेमाल किया जा सकता है।
- कौन-से foods या situations symptoms को बढ़ाते हैं, यह समझने के लिए food and symptom diary रखें।
- बहुत ज्यादा restrictive diet खुद से शुरू करने के बजाय डॉक्टर या dietitian की सलाह लें।
- धीरे-धीरे और आराम से खाना खाएं, जल्दबाजी न करें।
- एक साथ बहुत ज़्यादा खाने के बजाय, थोड़ी-थोड़ी मात्रा में बार-बार खाना खाएं।
2. दवाइयां
- एंटीस्पास्मोडिक्स (Antispasmodics) – जैसे Hyoscine और Dicyclomine, पेट दर्द और ऐंठन कम करने में मदद करते हैं।
- लैक्सेटिव्स (Laxatives) – अगर कब्ज़ ज्यादा है तो फाइबर सप्लीमेंट या Polyethylene Glycol दिया जाता है।
- Anti-Diarrheal – जैसे Loperamide (Imodium), IBS-D के लिए।
- एंटीडिप्रेसेंट्स (Antidepressants) – कम डोज़ में ये गट हेल्थ और दर्द कंट्रोल करने में मदद कर सकते हैं, खासकर अगर स्ट्रेस फैक्टर हो तो।
ध्यान रहे: कोई भी दवा बिना डॉक्टर की सलाह के शुरू न करें। IBS के लिए सही दवा हमेशा प्रमुख लक्षण (दस्त, कब्ज़, या दर्द) पर निर्भर करती है।
3. साइकोलॉजिकल थेरेपी और स्ट्रेस मैनेजमेंट
- CBT (Cognitive Behavioral Therapy) – स्ट्रेस और एंग्जाइटी को कम करने में मदद करता है।
- हिप्नोथेरेपी (Hypnotherapy) – ब्रेन को रिलैक्स करके IBS के लक्षणों को कंट्रोल करने में मदद करता है।
IBS के पर्याप्त प्रबंधन के लिए अक्सर एक multi-disciplinary टीम approach की ज़रूरत होती है, जिसमें फिजिशियन, डाइटीशियन और ज़रूरत पड़ने पर मनोवैज्ञानिक सभी शामिल हो सकते हैं।
IBS के घरेलू उपचार
कई लोग दवाइयों के साथ-साथ हल्के घरेलू उपचार (home remedies) भी आज़माते हैं, जो सामान्य पाचन आराम में मदद कर सकते हैं। ये उपाय हर किसी के लिए काम करें, यह ज़रूरी नहीं, और इन्हें दवा का विकल्प नहीं समझना चाहिए फिर भी हल्के, safe घरेलू तरीके आज़माने से पहले एक बार डॉक्टर से ज़रूर पूछ लें, खासकर अगर आप पहले से कोई दवा ले रहे हों।
- छाछ (मट्ठा) में एक चुटकी भुना जीरा और थोड़ी सी हींग मिलाकर पीना, पेट की गैस और भारीपन में आराम दे सकता है।
- अजवायन, सोंठ और हींग को बराबर मात्रा में पीसकर, भोजन के बाद हल्के गुनगुने पानी के साथ थोड़ी मात्रा में लेना, अपच में मदद कर सकता है।
- सौंफ का पानी भोजन के बाद पीना, पाचन को आराम देने में सहायक माना जाता है।
- अदरक, तुलसी और काली मिर्च का हल्का काढ़ा, पेट की गैस और तनाव से जुड़ी बेचैनी में राहत दे सकता है।
- खाने में लाल और हरी मिर्च जैसे तीखे मसालों को कम करना, और बाकी हल्के मसालों (जीरा, धनिया, अदरक, सौंफ) का संतुलित इस्तेमाल करना, पाचन तंत्र पर कम दबाव डालता है।
याद रखें ये सभी सामान्य, हल्के घरेलू तरीके हैं। अगर लक्षण गंभीर हैं, बार-बार लौट रहे हैं, या घरेलू उपाय से आराम नहीं मिल रहा, तो सीधे गैस्ट्रोएंटेरोलॉजिस्ट से सलाह लेना सबसे सही कदम है।
IBS में क्या करें और क्या न करें (Do’s और Don’ts)
क्या करें | क्या न करें |
भोजन ताज़ी सामग्री से बनाएं | भोजन को स्किप न करें |
food and symptom diary रखें | बहुत जल्दी-जल्दी खाना न खाएं |
नियमित व्यायाम करें | वसायुक्त, मसालेदार या प्रोसेस्ड भोजन कम खाएं |
relaxation techniques अपनाएं (योग, मेडिटेशन) | दिन में 3 कप से ज़्यादा चाय-कॉफी न पिएं |
थोड़ी-थोड़ी मात्रा में बार-बार खाएं | बहुत restrictive diet खुद से शुरू न करें |
पर्याप्त पानी पिएं | तनाव को नज़रअंदाज़ न करें |
IBS को कैसे मैनेज करें: दीर्घकालिक दृष्टिकोण
चूंकि IBS एक क्रॉनिक (दीर्घकालिक) स्थिति है, इसलिए IBS को कैसे मैनेज करें यह समझना, “IBS का स्थायी इलाज” ढूंढने से ज़्यादा व्यावहारिक है। ज़्यादातर मरीज़ों में हल्के से मध्यम लक्षण होते हैं, जिन्हें डाइट में बदलाव, जीवनशैली में सुधार और तनाव प्रबंधन के ज़रिए अच्छे से नियंत्रित किया जा सकता है। कुछ गंभीर मामलों में दवाओं या थेरेपी की ज़रूरत पड़ सकती है। लंबे समय तक इसे नियंत्रण में रखने के लिए धैर्य और नियमितता सबसे ज़रूरी है।
IBS में डॉक्टर से कब संपर्क करें?
अगर आपको बार-बार पेट दर्द, कब्ज़, दस्त या bowel movement में लगातार बदलाव हो रहा है, तो डॉक्टर से सलाह लेना ज़रूरी है। खासकर निम्नलिखित लक्षण होने पर medical evaluation में देरी नहीं करनी चाहिए:
- बिना किसी स्पष्ट कारण के वजन कम होना
- मल में खून आना या rectal bleeding
- रात में बार-बार दस्त होना
- आयरन की कमी या एनीमिया की समस्या
- नया या लगातार बढ़ता हुआ पेट दर्द
- उम्र बढ़ने के साथ पहली बार ऐसे लक्षण शुरू होना
- परिवार में colorectal cancer जैसी गंभीर बीमारी का इतिहास होना
इन लक्षणों का मतलब यह नहीं है कि आपको कोई गंभीर बीमारी निश्चित रूप से है, लेकिन इनके मौजूद होने पर IBS मानकर खुद से इलाज करने के बजाय डॉक्टर से जांच करवाना ज़रूरी है।
HealthPil कैसे मदद कर सकता है?
HealthPil आपको Gastroenterologists (गैस्ट्रोएन्टरोलॉजिस्ट्स) से कनेक्ट करता है जो IBS मैनेजमेंट में एक्सपर्ट हैं। अगर आपको या आपके परिवार या दोस्तों में किसी को बार बार कब्ज या दस्त की प्रॉब्लम हो रही है तो अपनी पर्सनलाइज़्ड ट्रीटमेंट प्लान के लिए अभी कंसल्टेशन शेड्यूल करें!
सारांश
IBS (Irritable Bowel Syndrome) एक functional gastrointestinal disorder है, जिसमें पेट दर्द, गैस, ब्लोटिंग, कब्ज़, दस्त और bowel movement में बदलाव जैसे लक्षण हो सकते हैं। इसके तीन प्रमुख प्रकार IBS-C, IBS-D और IBS-M हैं। IBS का कोई एक निश्चित कारण नहीं होता; gut sensitivity, gut-brain axis, diet, stress, infections और hormonal changes जैसे factors इसकी भूमिका में हो सकते हैं। सही diagnosis, balanced diet, lifestyle changes, stress management और जरूरत के अनुसार medicines से IBS के symptoms को manage किया जा सकता है।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQs)
1. क्या IBS कोई गंभीर बीमारी है?
IBS आमतौर पर जानलेवा बीमारी नहीं होती और यह आंत को स्थायी नुकसान नहीं पहुंचाती। हालांकि, इसके symptoms daily life और quality of life को प्रभावित कर सकते हैं।
2. क्या IBS का कोई स्थायी इलाज है?
IBS का कोई एकमुश्त स्थायी इलाज नहीं है, लेकिन diet, lifestyle changes, stress management, psychological therapy और जरूरत के अनुसार medicines से इसके symptoms को लंबे समय तक manage किया जा सकता है।
3. क्या IBS कैंसर में बदल सकता है?
नहीं, IBS अपने आप colorectal cancer में नहीं बदलता। IBS और inflammatory bowel disease (IBD) अलग-अलग conditions हैं। हालांकि, IBS जैसे symptoms दूसरी digestive diseases में भी दिखाई दे सकते हैं, इसलिए warning signs होने पर डॉक्टर से सलाह लेना जरूरी है।
4. क्या तनाव से IBS के लक्षण बढ़ सकते हैं?
हां, तनाव और anxiety कुछ लोगों में IBS के symptoms को बढ़ा सकते हैं। इसलिए stress management, relaxation techniques और जरूरत पड़ने पर psychological therapy IBS management का हिस्सा हो सकती है।
5. IBS होने पर किस डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए?
अगर पेट दर्द, बार-बार कब्ज़, दस्त या bowel movement में लगातार बदलाव हो रहा है, तो Gastroenterologist (गैस्ट्रोएन्टरोलॉजिस्ट) से consultation लेना उचित है। खासकर वजन कम होना, मल में खून, रात में दस्त, anemia या लगातार बढ़ता पेट दर्द जैसे warning signs हों तो medical evaluation में देरी नहीं करनी चाहिए।
References
- Ford AC, Sperber AD, Corsetti M, Camilleri M. Irritable bowel syndrome. Available at:
PubMed - Nathani RR, Sodhani S, Goosenberg E. Irritable Bowel Syndrome. StatPearls Publishing. Available at:
NCBI Bookshelf
Disclaimer:
यह लेख केवल शैक्षिक उद्देश्य के लिए है। किसी भी मेडिकल स्थिति के लिए डॉक्टर से परामर्श ज़रूर लें।
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